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आलोचना! १

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भैया श्री विशाल ‘स्वरूप’ ठाकुर से मैंने गुज़ारिश की थी कि वे एकतरफा प्रेम पर अपनी राय रखे।
मैंने जब उनसे यह कहा तो मैं काफी संजीदगी से भरे लेख की उम्मीद कर रहा था। मगर इन्होंने हास्यास्पद बनाकर रख दिया। अंत में विकृत ला दी। मानो ठुकरा के मेरा प्यार मेरा इंतक़ाम देखेगी। को एक लेख की भांति लिखा जाता तो शायद यह इनका होता।
उनकी कुछ बातें सही भी है।
प्रेम तो प्रेम होता हैं। लेकिन, उन्होंने एक तरफा प्रेम को रायता समझने की भूल की। एक तरफा प्रेम भी एक प्रेम ही है। दोतरफा अच्छा हो, एक तरफा रायता ऐसी बातें नहीं चलेंगी।
उपनिषदों में कहा गया है:-
“ये भ्रम नहीं है।
ये भ्रम नहीं है।
ये भी भ्रम नहीं है।
वो भ्रम नहीं हैं।”

जिंदगी में भी
“ये प्रेम नहीं है।
ये प्रेम नहीं है।
ये भी प्रेम नहीं है।
वो भी प्रेम नहीं है।”
में उलझ कर रख दी गई है। प्रेम एक ऐसा भाव है जो मनुष्य में करुणामयी बनाता है।
अब प्रेम में पा लेने वाली बात पर आते हैं। इन्होंने महाभारत का जिक्र किया और कर्ण द्रौपदी प्रेम और अर्जुन द्रौपदी विवाह का जिक्र किया। यह पा लेना क्या होता है? मुझे कोई समझाए। प्रेम देने की चीज है या पा लेने की। जब हम एक तरफा प्रेम करते हैं तो हम प्रेम निछावर करते हैं। यह आशा रखना ही गलत है कि आपको प्रेम वापस मिलेगा। प्रेम में आई आशा स्वार्थ का रूप ले लेती है। जिसकी पूर्ति न होने पर वह घृणा में बदल जाती है। जो अक्सर लड़कों में देखी जाती है।
अब आते हैं कि लड़की ही दो तरफा प्रेम कर सकती है।
यह सामान्यीकरण करना लड़कियों के साथ अन्याय की भांति होगा। हर एक लड़की का प्रेम दो तरफा नहीं होता। वे भी एकतरफा प्रेम करती है। और शायद हमसे ज्यादा चुप रह लेती है।
पुरुष अपनी इच्छा तुरंत व्यक्त कर देता है। क्योंकि हमारा सामाजिक ढांचा वैसा बना है। जो लड़की एकतरफा प्रेम करती है। वो कह भी न पाती। कह दे तो डेस्परेट होने का लांक्षण लग जाएगा। और न कहे तो इनके लेख के अंत को पढ़ ले। अगर शिष्टता से कहनी हो तो।

प्रेम निःस्वार्थ होगा तो उसमें न अपेक्षा होगी। और न उसकी पूर्ति होने पर दर्द होगा। सिर्फ और सिर्फ पवित्र प्रेम होगा।

और एक तरफा प्रेम तो अपेक्षा विहिन ही क्योंकि वो तो एक तरफ से ही होता है दूसरे तरफ की ओर।

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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