Poetry

बाकी है

जितना चला,उतना चलना बाकी है।
जितना बदला,उतना बदलना बाकी है।।

अब हमें रुकना नहीं है,
अभी यह मैराथॉन बाकी है।
जिंदगी है यूँ उलझी हुई,
इसे सुलझाना बाकी है।

जितना वक्त बदला उससे कहीं अधिक बदलना बाकी है।
जैसा जिया,उससे बेहतर जीना बाकी है।।

अभी बीता पतझड़ है,
वसंत का आना बाकी है।
गर्मी के संघर्षों के बाद,
किसानों का मॉनसून स्ट्रगल बाकी है।

जितना उन्हें मैंने देखा,उतना देखना बाकी है।
जितना समझा,उससे ज्यादा समझना बाकी है।

बाकी है तुम्हारा अब कहना,
बाकी है तुम्हारा सुनना,
बाकी है वो बताना,
जिसे तुम्हें जानना बाकी है।

थक हूँ चूका बहुत,थकना और बाकी,
बाकी है अभी तुम्हारा थक के चूर हो जाना।

पढ़ी मैंने ढेरों किताबें,अभी पढ़ना और बाकी है।
लिखा हूँ जितना उतना लिखना बाकी है।

Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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