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बिनती : प्रेम के सफर का एक हिस्सा

हम हमेशा प्रेम को ढूंढने के सफर में लगे रहते हैं। हम चाहे कितने भी आत्मनिर्भर हो। हम चाहे कितना ही स्वंय से प्रेम कर ले। लेकिन, हमारा किसी को प्रेम देने और किसी के द्वारा प्रेम पाने की इच्छा कभी समाप्त नहीं होती। और जीवन सफर में आगे बढ़ते रहते हैं। जहां हम प्रेम के अर्थ को और सच्चे प्रेम को तलाशने की कोशिश करते रहते हैं।

सफर जिसकी कोई मंजिल नहीं।
बस केवल तलाश है।

अच्छी बात भी है, क्योंकि हम नफरत को परिभाषित या उसे जानने के बजाय हम सब प्रेम को जानने में लगे हैं। जो कि काफी अच्छी बात है।

धर्मवीर भारती की किताब, गुनाहों का देवता भी हमें प्रेम सफर में ले जाती है।

जहां चन्दर और सुधा का प्रेम देखते है हम, सुधा के तड़पन को महसूस करते हैं।

मगर, हम बिनती के किरदार की ओर हम शायद पढ़ते समय और जीवन दोनों समय ही भूल जाते हैं। कि कोई बिनती भी इस दुनिया में है। हमारे जीवन में है। जिसे न प्रेम पाने की लालसा न खोने का गम वो तो बस है। और केवल निःस्वार्थ प्रेम देना जानती है। उसके अंदर अपनी माता से प्रेम न मिलने पर बिल्कुल घृणा ने जन्म नहीं लिया। बल्कि, प्रेम फला-फूला। सुधा और चन्दर द्वारा ज़रा सा पुचकारे जाने पर जो प्रेम उन दोनों को निछावर कर देती है कि सारे दृश्यों का सामान्यीकरण को जाता है। जैसे आम हो जाता है जीवन में किसी के द्वारा दुत्कारे जाने पर किसी बिनती का दिखाई न पड़ना।

सुधा और चन्दर के प्रेम को निश्चल है। और शारीरिक नहीं था। वह हृदय में बसता है।

वहीं चन्दर और पम्मी का प्रेम बाह्य है।

लेकिन, हम बिनती के प्रेम को कहां स्थान दे। समझ ही नहीं आता। बिनती क्या चाहती है? बिनती को भी नहीं पता। हां, लेकिन, बिनती में प्रेम भर-भरकर भरा था। जो कहीं न कहीं निकलना था, सो चन्दर के चरणों में सब रख दिया।

हमें अपने प्रेम सफर का आत्ममंथन करना पड़ेगा और सफर के पड़ाव में बिनती को साथ लेकर चलना होगा।

  • प्रदीप कुमार
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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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