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दो कवियों की रचना

ऐसा कुछ नहीं होता,
खासकर के जैसा हम सोचते हैं,
वैसा कुछ नहीं होता।

आना-जाना, रोना-धोना
रुककर चलना, चलकर रुकना
रुकना ही, या चलते ही जाना
सफ़र किसी के संग हो!
ऐसा कुछ नहीं होता,
खासकर के जैसा हम सोचते हैं,
वैसा कुछ नहीं होता।

होता वही है जो
होना होता है।

होनी को होते देते रहना चाहिए
जैसे नदियों के सफर को बहते

सब मिलेंगे समंदर में
बीच में डेल्टा आएगा

डेल्टा जीवन का पुनः प्रेम कहलायेगा
आगे मुसाफिर फिर बढ़ना।

समंदर में मिलने जाना है।
हमें रुकना नहीं बस चलते जाना है।

-विशाल स्वरूप ठाकुर और अपना घरौंदा के संस्थापक प्रदीप कुमार की रचना।

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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