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गांव होते शहर,शहर बनता गांव

जब कोई आदमी गांव छोड़कर शहर की ओर बढ़ता है,तो वह अपने अंदर रखा गांव छोड़कर आता है।आता भूलकर अपनी बोली,रस्मों रिवाज तोड़ आता है। ऐसा ही लगता है सबको जब कोई आदमी जाता है,शहर को,लेकिन,यह सब बाते बेईमानी सी लगती है। टटोलकर देखिए, न अपने अंदर क्या गांव भूला आए है?

नहीं,बिल्कुल नहीं, जब दिल्ली, मुंबई जैसे देश के मेट्रोपोलिटन शहरों में गांवों का त्योहार छठ पूजा मनता है तब तो नहीं।जब वहां भी नदियों की तलाश कर भास्कर देव को अर्घ देते है,उस समय मानों लगता गांव की संस्कृति और शहर के व्यवहार का मिलन हो रहा हो।

शहर में आया काम की तलाश में मजदूर जो गांव का किसान था, जिसने मेहनत कर-कर के शहर में अपना नाम बनाया, फ्लैट ले लिया वो नहीं भूलता,गांव की पगडंडियों में चलते वक्त मोच को,न ही वो छुपा पाता अपने चोट खाए बच्चों से अपने बचपन में पेड़ों से फल तोड़ते और माली से भागते वक्त लगने घावों को।जब बेटी उसकी खाती चाकू से काटकर फलों को वो भी बताता अपनी गुड़िया को गन्ने के रेशों को दांतों को छिल कर।

परिस्थिति जैसी हो मजबूरी का नाम जो भी शिक्षा, बेरोजगारी, आर्थिक हालत जो भी हो जब-जब भी एक व्यक्ति शहर को चलता है,तब-तब शहर गांव की ओर चलता है और होता शहरीकरण है।उस शहरीकरण में लोग, गांव को समेटे चलते है, और शहर, गांव में उनका हाथ पकड़ चला आता है।

जिसके सबूत मिलते गांवों के युवकों की अंगुलियों में व्हाट्स एप के मैसेजों में रीप्लाई करते हुए,इंटरनेट का इस्तेमाल कर यूट्यूब और फेसबुक के माध्यम से दुनिया से जुड़ते लोग हैं।शायद अंगने की बात खत्म हो गई है अंगने शहर की सोसायटी के कम्पाउंडों,पार्कों में सीमित हो गए है।अब गांवों में खड़ी चार दीवारी है।ठेलों में भूटों की जगह मिल रहें चौमीन है और चौड़ाहे पर लैमनचूस विलुप्त है।

   भारत में हर तीन में से दो व्यक्ति गांवों में रहते है,लगता है सब तीसरे व्यक्ति बनते जा रहे है।

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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