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महामारी के दौर का प्रेम

आज सोचा कलम उठती हूं
और पन्नों को इस दूरी के दर्द से सजती हूं
प्यार साथ रह कर बहुत किया
अब दूर रहने के दर्द को आज दर्शाती हूं

पन्ने भर्ती गई लकीरें काटती गई
कुछ दर्द निकल ही नहीं पाया
शायद इस महामारी में दूरियां तो बढ़ी
पर दिल ज़रा भी दूर ना जा पाया

तो क्या हुआ तुझसे लिपटे आंखे ना खुली मेरी
उठने पे सबसे पहला कॉल तेरा पाया
तो क्या हुआ दिन भर साथ नहीं है हम
24 घंटे संग है हम बन के एक दूजे का साया

हां कुछ चीजें है जो ये दूरियां बताती है
तुझे छूने की काश कभी कभी बडा तड़पाती है
वीडियो कॉल में देख के कितना भी मुस्कुरा लू
ये नम आंखे तेरे दूर होने का एहसास ज़रूर कराती है

आवाज़ सुन लू तेरी जितनी भी
तेरा वो मेरे कान में धीमे से बोलना याद आता है
कितना भी रो लू कॉल पे में
तेरे कंधे पे सर झुकाना याद आता है
याद आता है बहुत तेरा मेरे साथ होना
इन दिनों तू थोड़ा ज्यादा ही याद आता है

महीने गुजरने को है
और कितने दिन है कोई जानता नहीं
बिना शादी के प्यार के दर्द को
तो यहां कोई पहचानता नहीं
वो लाल रंग अगर दर्द दिखा दे
तो डूबा दो मुझे लाल समुंदर में
ये दिल तेरे बिना 1 और दिन रहने को
ज़रा भी मानता नहीं

ये दूरी हमारे प्यार को ना तोड़ पाई ना कभी तोड़ पाएगी
चल देख ले ये मोहब्बत हमें और कितना तड़पाएगी
जब दिल एक होता है तो कुदरत भी सर झुका देता है
वो सफ़ेद रोशनी की लहर जल्दी ही वापस आएगी

©विशाखा सिंह (मेहमान लेखिका)

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Guest Author

मेहमान लेखक/लेखिका वो है जो 'अपना घरौंदा'पर कभी कभार लिखते हैं।

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