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मानसिक रूप से पीड़ित ‘हम’

बीते एक सप्ताह में देश के कई राज्यों की प्रमुख जगहों में बलात्कार की बहुत सी घटनाएं ,पूरे मुख्यधारा की मीडिया तथा पूरे सोशल मीडिया में छाई हुई है और इन घटनाओं को लेकर दुष्पत्रकारिता हो रही है। सुप्रीम कोर्ट के बलात्कार के मामलों में रिपोर्टिंग के लिए जो निर्देश है,उसके अनुरूप जो पीड़िता है ,उसका नाम,चेहरा उसके पहचान से जुड़ी किसी भी तरह की जानकारी देना गलत है। लेकिन,सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करके कई न्यूज चैनल और अखबार खुले तौर पर पहचान बता रहे है। वहीं सोशल मीडिया की बात करें तो पीड़िता की तस्वीरें वायरल हो रखी है। फेसबुक पर पीड़िता के सर्पोट में उसके फ्रेम प्रोफाइल फोटोज में लगाने का ऑप्शन भी अब उपलब्ध है।”क्या यह सब मजाक है?,यह पीड़िता तथा इस देश-दुनिया की महिलाओं के साथ जुड़े अपराधों का माखौल उड़ाया जा रहा है।”हम एक असंवेदनशील समाज में जी रहे है।

जिसमें मेरा अब दम घुटने लगा है।”मैं प्रदूषित हवा में तो सांस ले सकता हू़,पर इस प्रदूषित समाज में नहीं।”

पूरे देश तथा सोशल मीडिया में आक्रोश का माहौल है,सभी पीड़िता के आरोपियों के खिलाफ सजा की मांग कर रहे है,पर न्याय की मांग कम ही है।लोगों को जानना चाहिए कि सजा और न्याय में फर्क होता है।सजा आरोपी को मिलती है,लेकिन, भुगतना पीड़ित व्यक्ति को पड़ता है।’न्याय’ अगर, पीड़ित को मिले,तो समाज पर इसका असर पड़ता है।

फांसी.फांसी..फांसी…जलाने वाले को जला दो,मारने वाले को मार दो।क्या ऐसे में न्याय प्राप्त हो जाएगा? नहीं, बिल्कुल नहीं अगर फांसी देने से गुनाह खत्म हो जाते तो निर्भया गैंगरेप जो कि पूरी मीडिया, पूरी समाज के दबाव के कारण सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को फांसी की सजा सुना,सिवाय एक जुवेनाइल को छोड़कर।क्या इसके बाद कोई घटना नहीं घटी क्या?बीते छह महीने में 24,212 बलात्कार और यौन हिंसा के मामले दर्ज हुए है।ये वे मामले है,जो दर्ज हुए है सही आंकड़ा इसके पड़े है।

इस समाज में अगर इन घटनाओं को खत्म करना है तो इस बार सामाजिक बदलाव लाने की आवश्यकता है।इस बार तो कम-से-कम हम अपनी गलती माने,जिन्होंने इस समाज को ऐसा बनाया।एक मनौवैज्ञानिक स्तर पर चर्चा शुरू हो, की आखिर, यह घटनाएं आखिर हो ही क्यों रही है?

क्या इस समाज के कुछ तत्व मानसिक रूप से विकृत है?या यह पूरा का पूरा समाज पीड़ित है?जब कोई बीमार होता है तो हम इलाज करवाते है,मारते नहीं उसे।यह समाज भी बीमार है?यह समाज पितृसत्तात्मक व्यवस्था,लिंग-भेद की बीमारियों से ग्रसित है?इसके इलाज की आवश्यकता है।आक्रोश से कुछ नहीं होगा।हैवान.हैवान..कहकर हम खुद हैवान बने पड़े है।”हैवानियत को खत्म करें,हैवान को नहीं।””गुनाह को खत्म करें गुनाहगार को नहीं।”हैवान को जलाने,बीच चौराहें जला देनी की बातें इंसानियत का नाश कर रही है।

राम सिंह निर्भया गैंगरेप का आरोपी जिसे फांसी की सजा हुई।उसने जेल में रहकर आत्महत्या कर ली।क्या कारण रहा होगा?पता नहीं।।पर यह बातें हमारे जहन में सवालिया निशान खड़ी करती है।

बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री,”India’s Daughter” जो की निर्भया मामले पर बनी थी। उसमें आरोपियों के इंटरव्यू लिए गए।उसमें इंटरव्यू के दौरान उनसे पूछा गया,क्या आप दोबारा अगर वैसी स्थिति में होंगे तो क्या आप वैसा ही काम करेंगे। उन्होंने कहा, हां,क्योंकि वो है ही उसी लायक।क्या जरूरत थी ,उसे इतनी रात को निकलने की।
यह बात भी इस न्याय व्यवस्था पर सवाल उठाती है।

यह समाज मानसिक रूप से पीड़ित है,अगर उस समय,आक्रोश की जगह इलाज किया जाता तो शायद मेरे शहर रांची की मेरी बहन सी लड़की का बलात्कार न होता। हैदराबाद की पीड़ित महिला की तस्वीर आज वायरल न होती।उन व्यक्तियों को खत्म करके हमने केवल अपनी गलतियों पर पर्दा डाला।अगर,उन व्यक्तियों में बदलाव की बात करते तो शायद आज यह दिन न होता जब मैं यह लेख लिख रहा होता।शायद, रामसिंह को एहसास हुआ अपनी गलती का और बाकियों को नहीं।हमें बदलाव की जरूरत है।

कहां से आए थे वो लोग? क्या मानसिकता रही होंगी उनकी?वे एक निरक्षर समाज के थे।गरीब जहां इस बात की चर्चा ही नहीं होती कि महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाए। उन्होंने समझी ही नहीं यह बात।जिस मानसिक स्तर पर चर्चा की बात मैं कर रहा हूं,जिस पितृसत्तात्मक व्यवस्था को,जिस लिंग-भेद की मैं बात कर रहा हूं।शायद इसका मतलब ही नहीं पता था,उन्हें।और न पता है उन सभी लोगों के पास जिन्होंने ऐसे कई घिनौने कृत्य किए।

क्या आपको आभास है?
क्या आपमें समझ है,इन बीमारियों की?
क्या आप अपनी गलती मानते है,इस समाज के इस माहौल को बनाने में?

याद,रखिए,शहर में कुड़े का ढेर, घरों से निकले कचरे से बनता है।

“सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है।
जो उन वीरान होती, सड़कों पर चढ़ता है,
जहां,कल कोई कैंडल मार्च निकालेगा।
मगर,उसकी जलती लौ तुम्हारी आंखों को नहीं जलाएगी।”

मानसिक रूप से पीड़ित ‘हम’! इस हम में मैं भी हूं।मुझे अपनी गलती का आभास है,मैं भी कहीं न कहीं मानसिक रूप से इन बीमारियों से पीड़ित हूं!

आइए, इलाज की बातें करते है।आइए,बदलाव की बातें,करते है।आइए,उन पीड़ितों के लिए न्याय की मांग करते है। आइए, कम-से-कम चर्चा तो शुरू करते है।

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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