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मैं नहीं जानता

कितना और इंतजार बचा है
तेरे और मेरे मिलने में

जब से बिछड़े है
केवल यादें ही तो है तेरी

रोज सपनों में, वही
स्मृतियां कौंधती है

बेआवाज चुप सी तुम
कहती क्यों नहीं?

आती हर सपने में हो, लेकिन‌
जाते हुए सुबह नहीं देखा

रातें बीतने को है, और
अंधकार उजाले से मिलने को

मैं नहीं जानता!
और कितना इंतजार बचा है?

अपना घरौंदा से_ © प्रदीप कुमार


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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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