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मेरे देश में मचा बवाल 

     नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019,इन शॉट सीएए। नागरिकता देने वाले इस कानून में ऐसा क्या है जो इस देश के नागरिक ही सरकार के खिलाफ इस कानून को लेकर मोर्चे पर खड़े हो गए है।पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे है, कहीं एक दिन, तो कहीं कई दिनों से तो, कहीं कई दिनों से 24×7 विरोध हो रहे है। मुख्यतः जो खबरों में बना है, और टीवी की कवरेज है, वह है,शाहीन बाग जहां पर महिलाओं के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन हो रहे,है। भारी सर्दी में 24×7 विरोध प्रदर्शन। पर ऐसा क्या है,इस क़ानून में जो इतने विरोध प्रदर्शन हो रहे है।

इतिहास से लेकर अबतक

थोड़ा इतिहास पर चलते है, नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019, संशोशन,यह शब्द तब आता है जब पहले से कुछ हो,उसमें हम कुछ बदलाव करते है तो यह भी संशोधित किया गया है,और किसमें किया गया है। यह किया गया है, नागरिकता कानून,1955। हर देश में एक नागरिकता कानून होता है,जो यह बताता है कौन देश का नागरिक होगा और कौन नहीं। भारत का भी है,अपना भारत में नागरिकता कानून है जो कि 1955 में लाया गया। जिसमें  सरल शब्दों में समझाया जाय तो मोटा-माटी यही कहा कि भारत का नागरिक कौन होगा? उसकी एक परिभाषा और विभिन्न प्रक्रियाएं जिनसे आप,या कोई बाहरीय भारत की नागरिकता हासिल कर सकता है। उदाहरण के लिए, मसलन आपका या आपके माता-पिता का जन्म भारत में हुआ है तो आप इस देश के नागरिक हैं और भी कई चीजें हैं,जो कि संविधान के अनुच्छेद 6 में मौजूद है,और नागरिकता प्राप्त करने की प्रक्रिया को पूर्ण करने वाला व्यक्ति को भी भारत की नागरिकता मिल सकती है, उसमें कोई जाति,धर्म देश का भेदभाव नहीं है।

 अब तक भारत में चार बार इस क़ानून में संशोधन किया गया है, वर्ष 2003,2005,2015 और 2019 में चौथी बार यह किया गया है। इतने संशोशन हुए इस कानून में,मगर इससे पहले कभी भी ऐसा बवाल नहीं हुआ तो इस बार क्या हुआ? जो लोग सड़कों पर उतर आए हैं और अपना विरोध प्रदर्शन जताने लगे, नागरिकता संशोधन अधिनियम 1955 में मौजूद है उसमें बदलाव किया गया है बाहरी व्यक्ति को नागरिकता लेनी है तो उसमें दी गई है जिसमें 11 साल से घटाकर 5 साल कर दी गई है और डेट है 31 दिसंबर 2014 कर दिया गया है यानी 31 दिसंबर 2014 से पूर्व भारत में अवैध रूप से आने वाले विदेशी जो कि 5 वर्ष तक भारत में रहे हैं उन्हें नागरिकता दी जाएगी इसमें भारत सरकार ने चिन्हित पाकिस्तान बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए अवैध रूप से आए हिंदू,बौद्ध,जैन,पारसी,सिख धर्म समुदाय के लोगों ही इस कानून के तहत शामिल किया गया है।अब भी अन्य धर्म के लोग इस कानून तहत नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते है, बशर्ते वे नागरिकता कानून,1955 में मौजूद प्रक्रियाओं में पास हो। लेकिन, इस कानून में चिन्हित रूप से देशों और धर्म के चुनकर उन्हें खास रियायत देना, सरकार की भेदभावपूर्ण सोच और उनकी मनसा पर सवाल उठाता है। भारत सरकार जिसे निश्पक्ष होकर बिना किसी भेदभाव के काम करना चाहिए। वो संस्था आज नरेंद्र मोदी सरकार के नेतृत्व में एक सामाजिक भेदभाव वाले कानून को लाती है, जिसमें उनका राजनीतिक स्वार्थ छुपा है।

  वैसे इस वक्त जो भी अवैध प्रवासी जो इन शर्तों में आता है,उसे इस कानून के अंतर्गत नागरिकता चाहिए तो उन्हें अब भी यह दस्तावेज देकर जानकारी देनी होगी सरकार कि वे यहां कब से आए है? कितने सालों तक रहे है? तब जाकर उन्हें नागरिकता मिलेगी,अब भी उन्हें नागरिकता नहीं मिली है,अब भी काफी जटिल प्रक्रिया से उन्हें गुजरना होगा।

बाकी, जो भी अप्रवासी लोग हैं, जो भारत की नागरिकता चाहते है,वे नागरिकता कानून 1955 में दी गई प्रक्रियाओं में पास होकर भारत की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं। इस कानून के तहत किसी की नागरिकता ली नहीं जाएगी। जो भ्रम फैला है।

 इस नागरिकता संशोशन अधिनियम 2019 की वजह से किसी की नागरिकता चली जाएगी ऐसा भ्रम जो फैलाया जा रहा है,वह गलत है। 

जब तक की हम एनआरसी वाली बात को सम्मिलित नहीं करते। कई बुद्धिजीवियों का मानना है,कि सीएए और एनआरसी मिलकर भारत से मुस्लिमों को अलग कर देगा। और सीएए इसीलिए लाया गया है,ताकि एक फिल्टर का काम किया जा सके। किंतु, अबतक न वो आई है तो कहना मुश्किल है, मगर गृहमंत्री अमित शाह के कहे अनुसार वो आएगी। मगर,उसकी बात फिर कभी और मूल रूप से इस सीएए कानून को देखा जाए तो इसकी अपनी खामियां और भेदभाव है।

 इस वक्त देशभर में प्रदर्शन विभिन्न रूपों में बटा है और लोग एनआरसी की चर्चा लोग ज्यादा कर रहे है। मैं इस लेख में देशव्यापी एनआरसी को इसमें जोड़कर नहीं देखता। उसपर फिर किसी और लेख में चर्चा क्योंकि अभी सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच जो की इस कानून को खत्म करने के लिए जो 144 पेटीशन दी गई है, उसमें सीएए को एकमात्र कानून होगा जिसपर सुप्रीम कोर्ट चर्चा करेगी,वह भविष्य की आशंकाओं को नहीं देखेगी। वैसे भी विरोध प्रदर्शनों ने कमसकम सरकार को थोड़ा एनआरसी के मसले पर बैकफुट पर लाया है।

प्रदर्शन

देशभर में प्रदर्शन दो प्रमुख मुद्दों पर अलग-अलग है।एक विरोध प्रदर्शन एक पूर्वोत्तर में असम राज्य के लोग कर रहे है। उनकी समस्या यह है,उनके यहां कई सालों से अवैध रूप से आए बांग्लादेशी प्रवासी आते रहे,जिससे असम की स्वयं के मूल निवासियों की भौगोलिक स्थिति अल्पसंख्यक हो गई थी। और इसके खिलाफ कई हिंसक प्रदर्शन हुए। अंत में भारत सरकार और असम के बीच असम एकॉर्ड साइन हुआ। जिसके तहत एनआरसी लाई जाएगी, इसमें कट ऑफ डेट 1971 थी,याने तबतक आए बांग्लादेशी भारत के नागरिक होंगे।

  वर्ष 2018 में मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार एनआरसी को की प्रक्रिया को पूरा करने का प्रयास किया। जिसमें असम के सभी नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ी लेकिन इसमें कई लाख लोग असफल हो गए। यहां तक कि भारतीय सेना में काम करने वाले पूर्व जवान भी अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सके।

     अब इतनी कठिन परीक्षा से गुजरकर असम के लोगों को यह डर है कि सीएए के कारण जो अवैध बांग्लादेशियों को निकाला जाने वाला था वह अब यही रह जाएंगे जिससे उनकी भौगोलिक दशा खराब हो जाएगी। जिसके लिए वे इस कानून के आने से पहले इस कानून के आने के बाद अपनी लड़ाई लड़ते आ रहे हैं।

दूसरी ओर संविधान की दुहाई देकर आर्टिकल 14 का जिक्र करते हुए, देश में यह धर्म से जुड़ा मसला बन चुका है। संविधान की उद्देशिका पढ़ी जा रही है।

  विशेषज्ञों की माने तो इस बात को साबित करना कोर्ट में काफी जटिल है। कुछ के अनुसार आर्टिकल 14 बराबरी के अधिकार का यह कानून उल्लंघन करता है। क्योंकि भारत सरकार ने इसमें परिभाषित नहीं किया है,कि किस आधार पर देशों और धर्म के लोगों को चुना गया है। वहीं दूसरे कुछ और दलील दे रहे है। फैसला अब सुप्रीम कोर्ट के पाले में है,अब वही कर सकता है जो उसे करना चाहिए। चाहे हम कितना भी विरोध प्रदर्शन कर ले। न्यायपालिका कानून का पालन करेगी,न कि विरोध प्रदर्शनों का।

 लेकिन,पूरे देश में एक धारणाओं का माहौल बना हुआ है।जहां एक धर्म समुदाय को टारगेट किया जा रहा है और लोग एकता के नारे लगा रहे है,इस भेदभावपूर्ण अधिनियम का बायकॉट कर रहे है। ऐसा इसलिए है कि अभी जो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार है और जो उनका संगठन आरएसएस है, उसकी छवि उसका इतिहास हिंदुत्व के एजेंडे को लेकर चला है। और सरकार के कई फैसलों ने इस धारणा को मजबूती दी है,जिसने  पूरे देश में सरकार के निर्णय को भेदभावपूर्ण समझा है। जहां केवल अपनी राजनीति के लिए बीजेपी ने यह सबकुछ किया है और केवल एक धर्म समुदाय के लोगों शामिल नहीं किया। धारणाएं सही भी हो सकती है और गलत भी।

 मगर, सरकार के इस कानून में खामियां है, साथ ही इससे हमारे पड़ोसी मुल्कों के साथ हमारे संबंध को खतरा है। चुनना किसी विशेष को अपने स्वार्थ के लिए वह भी गलत है। और किसी धर्म विशेष के खिलाफ जाना भी गलत है। भारत कोई धर्म के नाम पर चलने वाला देश नहीं है, यह धर्मनिरपेक्ष है, भारत का कोई धर्म नहीं है। इसीलिए,ऐसे टारगेट करना भी गलत है।

अब, सुप्रीम ही सर्वेसर्वा है,उसी के हाथ में भारत का भविष्य है।

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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