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नक्शा

तुमने प्रेम में चलते हुए,
बना दिया है एक नक्शा,
जो विस्तृत है शून्य तक,
जिसके ओर और छोर न जाने कहाँ हैं;
शायद वहाँ जहाँ तुम भी नहीं गए,
बस जाना चाहा, प्रेम में….
और ये खींचते चले गए;

झीलों ,नदियों, समुद्रों से होते हुए
तुम्हारे कदम जहाँ जहाँ पड़े,
वहाँ बनते चले गए मार्ग,
जो कल तक स्पष्ट थे,
जो आज अदृश्य हैं…

मैं अब शून्य को कहाँ ढूँढू,
तुम्हारे पदचाप जो अब गौण हैं,
क्या वे मुझे अंधकार में मिलेंगे?
या फिर मैं समा जाऊं प्रेम में,
और चल दूं रेत , कंकड़ , और सूखे पत्तों पर,
क्या तब खिचेंगे ये नक़्शे?
क्या मिलोगे तुम कभी?

फ़ाख्ता

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मेहमान लेखक/लेखिका वो है जो 'अपना घरौंदा'पर कभी कभार लिखते हैं।

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