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फला-फला मुखड़े पर पारदर्शी आंसू

      1994 में बॉलीवुड की एक फिल्म आई थी,’सुहाग’,उसका एक गाना बड़ा हिट हुआ था,जो आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा है,’गोरे-गोरे मुखड़े पर काला-काला चश्मा’। सोचता हूं,अगर,इस गीत के बोल में ‘गोरे’ की जगह ‘काले’ शब्द होता तो क्या यह गाना आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा होता। बॉलीवुड की कल्पनाओं के गीत हो चाहे, हम हो,चाहे आप हमारे मन-मस्तिष्क में महिलाओं की एक छवि-सी बनी हुई है। एक पैमाना तय कर लिया है, अगर, महिला इन पैमानों के खांचों में फिट बैठती है तो ठीक वरणा? अखबारों में बकायदा विज्ञापन छपते हैं, कि हमें एक फला कद की , फला आकार की ,फला रंग की , फला जात की,फला धर्म की,फला ,राष्ट्र की लड़की चाहिए? फला में क्या भरना हैं? आप समझदार है,स्वंय भर ले। हम ये क्यों नहीं देखते, की वो लड़की कैसी है, स्वभाव उसका कैसा है? हम पैमानों के पीछे पड़े रहते है। और इन पैमानों के पीछे छिपी रहती है, एक दबी हुई पितृसत्तात्मक व्यवस्था की कहानी जिसका जिक्र करने से भी हम डरते है। जहां पर औरत को इंसान नहीं एक वस्तु या जायदाद कह ले वो बनकर रह गई है। जहां हम जब विवाह संस्था एक वस्तु खरीद बिक्री का माहौल है और हम चीजें अच्छी चाहते हैं, अपनी मन की चाहते है? और चीजों का बोलना हमें स्वीकार्य नहीं। अगर, वस्तु इंसान होकर बोलने लगे तो उसे दूध में मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका जाता है। 

1792-1963

यह दरमियान था, पहली नारीवाद लहर का जिसमें पहली बार महिलाएं मानवीय तौर पर पहली बार बराबरी की मांग करती है। जिनका मुख्य उद्देश्य होता है, राजनैतिक बराबरी की मांग, मताधिकार का अधिकार। लेकिन, यह आंदोलन करता कौन है? इसपर जरा गौर करें तो पाएंगे, यह आंदोलन करने वालों में जो महिलाएं थी, वे संभ्रांत घर की गोरी महिलाएं थी। जो सड़कों पर अपने हक की मांग कर रही थी, वहीं जब वे घर आती तो वे स्वंय एक महिला का उत्पीड़न कर रही होती। काली गुलाम महिला, जिसे वे इंसान नहीं समझती थी।

   अब महिलाओं में वस्तु दृष्टिकोण तो खत्म हुआ पर नस्लीय दृष्टिकोण से वे अब भी निचली श्रेणी में कई महिलाएं थी।

1970

यह साल था, जब नस्लीय आधार पर हो रहे भेदभाव पर चर्चा व्यापक रूप में पहुंची। हम जब काले लोगों की गुलामी और भेदभाव पूर्ण रवैया उस हैवानियत की चर्चा करते है,तब हम यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि उन ग़ुलाम पुरुषों की गुलाम पत्नियों का क्या हाल होता होगा? दुगना शोषण ,पहला शोषण रंग भेद के कारण दूसरा लिंग-भेद के कारण। तब काला नारीवाद का अस्तित्व सामने आता है। जो इस नस्लीय उत्पीड़न और इस दोहरी शोषण की मार पर चर्चा करती है। 

  यह आगे चलकर व्यापक रूप से महिलाओं के शोषण को देखने के नजरिये का बीज देता है।

1989

किमबर्ल क्रिनशॉ ने आगे चलकर इस बीज को जन्म दिया और जो आज के समय में नारीवाद का नया दृष्टिकोण है। उन्होंने एक शब्द को दुनिया के समक्ष उछाला और उसे कहा, ‘अन्तर्विरोधी नारीवाद’ । जिसमें उन्होंने इन शोषणों की परत दर परत पर चर्चा की और कहा कि विभिन्न चीजें जैसे- राष्ट्र, धर्म, जाति, वर्ग, नस्ल, लिंग, क्षमता, अल्पसंख्यक समुदाय या बहुसंख्यक समुदाय ,संस्कृति, ये सारे तत्व आपस में अतिव्यापी तौर पर प्रतिच्छेदित है और महिलाओं के शोषण को उनपर हो रहे उत्पीड़न को इन तत्वों के विभिन्न स्तरों में जाकर हमें देखने को मजबूर करती है।

जैसे- एक संभ्रात घर की महिला की समस्या उसे बाहर काम न करने मिलना हो, या उसकी स्वतंत्रता का हनन उसके उत्पीड़न है। वहीं वही संभ्रात महिला जब एक सब्जी बेचने वाली महिला के यहां सब्जी लेती है तो उस सब्जी बेचने वाली महिला का उत्पीड़न अलग होगा, एक तो वह अपने पति की काम में सहायता करें, दूसरी ओर वही बच्चों और घर संभाले न उसे तनख्वाह मिलती, न ही कोई धनराशि पर उसका अधिकार होता है।

एक और उदाहरण में शाह – बानो केस में जब मुआवजे की मांग को लेकर वो कोर्ट जाती है तो उसे कोर्ट में दो तरीके से देखा जाता है ,एक तो महिला, दूसरी मुस्लिम। यहां उसका धर्म और लिंग दो अलग आधार पर कोर्ट उसे देखता है।

हम इसी फेरे में फंस कर रहा गए हैं।

हमारी सोच बराबरी की होनी चाहिए ,एक बराबरी के दृष्टिकोण से देखने की हमारी चेष्टा होनी चाहिए। जैसा मैंने कहा उस अखबार के विज्ञापन में बदलाव और बराबरी के भाव की जरूरत है। इन बॉलीवुड गानों में भी, महिलाओं को वस्तु की तरह दिखना, तंदूरी मुर्गी, देखना बंद करना चाहिए। और कहते है सिनेमा समाज का दर्पण है और इस समाज में हमेशा से यह सबकुछ पहले से मौजूद था,जिसे पर्दे पर उतारा जाता है, और लोग खुश होते है।

  बस, एक बार उस गाने में कुछ और डाल दे, मोटी, लड़की नाटी, दलित, काली, कुछ भी बस यह जो उनके आंखों में पारदर्शी आंसू इन उत्पीड़न के कारण आए है। उसे खत्म करने की ओर हमारा प्रयास होना चाहिए, बिना किसी भेदभाव के। नारीवाद बराबरी की ओर जाने का रास्ता है। इस नारीवाद में भी भेदभाव जाति,धर्म, नस्ल के नाम पर न हो। बराबरी से सभी को इंसान माना जाए और उसके लिए काम किया जाए।

 मेरी पहचान एक पुरुष के तौर पर है, और मैं स्वंय इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था का शिकार हूं। और मैं भी इस अन्तर्विरोधी नारीवाद का हिस्सा हूं । और शायद वो हर व्यक्ति जो इस समाज में दबाया गया है वे सब इसमें सम्मिलित है। चाहे वे लेस्बियन हो, गे हो, बाइसेक्सुअल हो, ट्रांसजेंडर हो, क्योर हो चाहे एक पुरुष ही क्यों न हो। 

 आधुनिक नारीवाद के इस प्रकार में हर कोई सम्मिलित है। यह नारीवाद सभी प्रकार के लोगों को बिना भेदभाव के बात करता है। जो इस नारीवाद की खासियत है। खासकर उन दलित महिलाओं की जिनका जिक्र हम नहीं करते। भारतीय समाज में दलितों के उत्पीड़न का एक गहरा इतिहास रहा है। तो दलित महिलाओं का कैसा होगा?

  इतिहास को पुनः लिखने की जरूरत है, जिसमें महिलाओं का जिक्र हो। नारीवाद का विचार हो।

  मैंने कहा है, फला-फला मुखड़े के पारदर्शी आंसू शायद इतिहास में आंसूओं को पी लिया है। लेकिन, इस इतिहास से हमें पितृसत्तात्मक व्यवस्था के क्रूरता और नारीवादी संघर्षों को निकालना पड़ेगा।

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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