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सबसे ख़तरनाक

पीत पत्रकारिता सबसे खत़रनाक नहीं होती,
चमचा पत्रकारिता सबसे खत़रनाक नहीं होती,
लालच से भरी पत्रकारिता सबसे खत़रनाक नहीं होती,
बैठे बिठाए,बिना ग्राउंड रिपोर्टिंग न्यू़ज बनाना बुरा तो है,
पर सबसे खत़रनाक नहीं होता है।

सबसे खत़रनाक होता है,फेक न्य़ूज वाली पत्रकारिता,
जो ले लेती ये मासूम मुसाफिरों की जान,
जिसकी लाश बता देती,उसकी जात-धर्म को।
न होना उस आग का हृदय में,
जो न सत्ता से लोहा ले पाती,
घर से निकलना द़फ्तर के लिए और द़फ्तर से लौट आना
सबसे खत़रनाक होता है,हमारे स्वंय के विचार का मर जाना।

सबसे खत़रनाक वो परिस्थिति होती है,
जब एक पत्रकार जब सत्ता को ललकारता तो है,
मगर तुम्हारे इंतजार करते हुए जब वह थकता है,
मगर उसे उठाने कोई हाथ आगे नहीं आता।

सबसे खत़रनाक वो आँख होती है,
जो रोज़ शाम प्राइम टाइम में तमाशे को देखती है,
जिसकी नज़र समीक्षा करना भूल जाती है,
जो न्य़ूज चैनलों से काले धुएँ की ओर मोहित हो जाती है,
जो रोज़मर्रा में भाईचारे को घृणा में बदल देती है,
एक तय लक्ष्य के इस दुष्पत्रकारिता के जँझाल में घूम हो जाती है।

सबसे खत़रनाक वो चाँद होता है,
जो हर रात मरती पत्रकारिता,
हर पत्रकार के हत्याकांड के बाद,
उन वीरान होती सड़को पर चढ़ती है,
जहाँ कल कोई कैण्डल मार्च निकालेगा,
मगर उसकी जलती लौह तुम्हारी आँखों को नहीं जलाती है।

सबसे खत़रनाक वो रात होती है,
जो लेकर आती है, आज की ब़हस का मुद्दा,
जिसमें सिर्फ उल्लू बोलते,गिदहड़ हुँआते,
चिपक जाते है,सब अपनी कुर्सी को लेकर,
और होने लगता इस बंद ईटयट बॉक्स में गालियों की बौछार।

सबसे खत़रनाक वो दिशा होती है,
जिसमें हमारी पत्रकारिता की डूब गई है,
और उसके बची हुई आंशिक किरणें,
तुम्हारे जिस्म के पूरब में धसने लगे।

पीत पत्रकारिता सबसे खत़रनाक नहीं होती,
चमचा पत्रकारिता सबसे खत़रनाक नहीं होती।

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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