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तिलिस्म-ए-झूठ

तिलिस्म-ए-झूठ,
रचा मेरे आस-पास।

पास है मेरी दोस्त,
जान-ए-बहार की आस।

आस है उसकी,
जिसकी परछाई भी न पास।

परछाई काली है,
जैसी काली जिंदगानी।

काली काजल आंखों में उसकी,
सुरमा जिसका मैंने लगाया।

ख्वाब-ए-जिंदगानी,में जीता हूं,
एक आस,सच्ची जिंदगी की चाहता हूं।

यह झूठ है कि मैं झूठ बोलता,
मेरी दोस्त यह जो सच था,जो मैं कह रहा।

-प्रदीप कुमार

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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