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ठंडी होती आग

भारत में सर्दियों का दिन आ गया है।जब सर्दियां दस्तक दे रही थी। उस वक्त देश में महिलाओं के साथ दुष्कर्म की वारदातों ने भारत में शीत लहर आने से पूर्व एक विरोध प्रर्दशनों की ‘लू’ चली थी।एक आग वापस से पनपा था, महिला सुरक्षा को लेकर,लेकिन,बीते दिनों हैदराबाद एनकाउंटर के बाद यह आग ठंडी हो चली है। लेकिन, महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा,उत्पीड़न और बढ़ती हिंसा की वारदातें कम नहीं हुई।

हमें लगता है कि हिंसा के खिलाफ हिंसा से न्याय मिल जाएगा। बलात्कारियों को फांसी के तख्ते पर चढ़ाकर,सब ठीक हो जाएगा।मैं पुनः यह बता दूं,यह सबकी मांग आप इसीलिए कर रहे है क्योंकि आप अपनी गलतियों से बचना चाहते है।आप उसपर पर्दा डालना चाहते है।हमें अपने घरों से बदलाव की शुरुआत करनी चाहिए,जो आग आप दिखा रहे थे,उसी आग को सीने में रखकर आपको अपने परिवार में नारीवाद विचारधारा पर चर्चा करनी, चाहिए, पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती देनी चाहिए,लिंग-भेद पर खुलकर विचार रखना चाहिए। महिलाओं को सर्वप्रथम खुद को इंसाफ खुद की लड़ाई लड़नी पड़ेगी,आप लोगों को देर रात खुलकर निकल सके इसके परिवार से लड़ना होगा।
उन समस्याओं पर बात करनी होगी कि आप निकल क्यों नहीं सकते।

बाहर अंधेरा है तो उजाले की बात करें,स्ट्रीट लाइटें लगवाए।अकेले नहीं घूमने की इच्छा तो सहेली या दोस्त के साथ घूमे।
निकले..जैसे मुंबई शहर में बैखौफ महिलाएं निकल सकती है।

लड़े न,कब तक अंधेरे में कैंडल मार्च करके उजाला करेंगी।
महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कानून व्यवस्था दूरस्थ करने की मांग करे।

एक अनुशासित तरीके से विरोध प्रर्दशन करें सब जिसमें एक वाजिब मुद्दे हो।

लेकिन,आपकी अंदर की आग इस ठंड में बुझने लगी है।
ठंडी होती आग,को जलाव।

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Pradeep Kumar

Founder, Editor-in-chief,Writer and PRO of Apna Gharaunda

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