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तुम कामयाब नहीं हो

तो तुम्हे लगता है कि तुम कामयाब हो ?

किसी स्त्री को चुप करा कर ,

अपने मर्द होने का सबूत दिखा कर,

तो जान लो बोलती जुबान सिर्फ सुनाई देती है ,

 और खामोशी दिखाई ….

तो तुम्हे लगता है कि तुम कामयाब हो?

किसी स्त्री को निर्वस्त्र कर के,

किसी की लाज की चीख को बंद कर के?

तो ये जान लो निर्वस्त्र हुई है तुम्हारी आत्मा ,

वो चीख जिसे तुमने किसी तक पहुंचने नहीं दिया,

वो रातों को तुम्हे सोने नहीं देगी।

तो तुम्हे लगता है कि तुम कामयाब हो?

किसी स्त्री के अधिकार को छीन कर?

किसी के अस्तित्व को नजरंदाज कर?

तो ये जान लो अस्तित्व किसी के प्रक्रियाओं का मोहताज नहीं,

खुद के हुनर पर गुरूर है न?

ये गुरूर दिया तुम्हे किसने है?

एक स्त्री ने न?

वहीं तुम्हारी मां है न?

पर तुम तो अब कामयाब हो,

खुद की ताजपोशी कर चुके हो

इस पितृसत्ता समाज में….

अगर ये तुम्हारी कामयाबी है 

तो हारे हुए हो तुम,

कुचले हुए हो अपने ही आप से,

लड़ नहीं पा रहे तुम 

खुद के ही सम्मान से…

मेरी नज़र में तुम एक ऐसे 

नाकामयाब नामर्द हो ,

जिसे अपनी मर्दानगी की शोभा 

औरतों के जरिए मिलती है…….

तो तुम कामयाब नहीं हो..

नहीं हो….

मेरे लिए कामयाब वो पुरुष है,

जिन्होंने पुरुष होने के दायित्व को निभाया,

नारी के लिए खड़े रहे,

लड़ते रहे, बेहसते रहे,

भले ही नाकामयाब रहे….

क्युकी उनका झुकना एक नारी के लिए,

समाज में जहर है, ये जहर है उस पुरुष प्रधान 

गतिविधियों के लिए,जिसने नारियों को 

मसल रखा है….

पर वहीं है जो कामयाब रहे …

बस वही कामयाब रहे…..

-प्रियंवदा….[मेहमान लेखिका]

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Guest Author

मेहमान लेखक/लेखिका वो है जो 'अपना घरौंदा'पर कभी कभार लिखते हैं।

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